१) इकरमा (रजि.) ले इब्ने अब्बास (रजि.) द्वारा उल्लेख गरे
अनुसार अल्लाहका रसूल (स.) ले उनको बुबा (इब्ने अब्बास (रजि) का बुबा) अब्बासलाई
भन्नुभयो “हे अब्बास ! हे मेरा प्रिय काका ! के म तपाईलाई एउटा विशेष चिज नदिऊँ? के म तपाईलाई १० वटा यस्ता कुराहरु नभनुँ जसलाई यदि तपाई
पूरा गर्नुहुन्छ भने अल्लाह तआलाले तपाइको सुरुका र अन्त्यका, पुराना र नयाँ, जान अन्जानमा, साना र ठूला, अरुको सामुन्ने र एक्लै गरिएका सम्पूर्ण पापहरुलाई क्षमा
गरिदिनेछन्? ती १०
वटा कुराहरु यी हुन् (अर्थात दुआलाई नमाजका विभिन्न चरण र क्रियामा दस पटक पढ्नु
हो) तपाई चार रकअत नमाज पढ्नुहोस् प्रत्येक रकअतमा सूरह फातिहा र अर्को एउटा सूरह
पढ्नुहोस् । जुन बेला तपाई पहिलो रकअतको किराअतलाई सम्पन्न गर्नुहुन्छ, कियामकै अवस्थामा भएको बेला १५ पटक यो दुआ पढ्नुहोसः
سُبحانَ اللهِ، والحمدُ للهِ، ولَا إلهَ إلَّا اللهُ، واللهُ أكبر
अल्लाह पवित्र छन् सम्पूर्ण प्रशंसा एवं आभार केवल अल्लाहका
लागि हुन् उनी बाहेक अरु कोही उपस्य छैन र उनी सबैभन्दा महान छन् ।
अनि रुकू गर्नुहोस् र रुकूमा उक्त दुआलाई १० पटक
पढ्नुहोस्। अनि रुकूबाट टाउको उठाउनु होस् र १० पटक उक्त दुआ पढ्नुहोस्। अनि
सज्दा गर्नुहोस् र १० पटक उक्त दुआ पढ्नुहोस्। अनि सज्दाबाट टाउको उठाएर
बस्नुहोस् र १० पटक उक्त दुआ पढ्नुहोस्। अनि दोस्रो सज्दा गर्नुहोस् र १० पटक
उक्त दुआ पढ्नुहोस्। अनि सज्दाबाट उठेर बस्नुहोस् र १० पटक उक्त दुआ पढ्नुहोस्।
यसरी प्रत्येक रकअतमा तपाई ७५ पटक उक्त दुआलाई पढ्नुहोस्। अनि दोस्रो, तेस्रो र चौथो रकअतमा पनि तपाई ७५ पटक उक्त दुआलाई
पढ्नुहोस्। यदि तपाई यो नमाज प्रत्येक दिन पढ्ने सामथ्र्य राख्नुहुन्छ भने
पढ्नुहोस्। यदि प्रत्येक हप्ता एक पटक पढ्ने सामथ्र्य राख्नुहुन्छ भने पढ्नुहोस्। यदि वर्षमा एक चोटी पढ्ने सामर्थ्य राख्नुहुन्छ भने पढ्नुहोस् र यदि जिन्दगीमा
एक पटक पढ्ने सामथ्र्य राख्नु हुन्छ भने पढ्नुहोस्।” (अबू दाऊद, इब्ने माजा, इब्ने खुजैमा, तबरानी, बैहकी)
टिप्पणियाँ
सलातुत तसाबीह के बारे में एक हदीस वर्णित है जिसकी सनद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक पहुँचती है और उसे कुछ विद्वानों ने हसन कहा है, किंतु बहुत से लोग उसके ज़ईफ होने और इस नमाज़ के वैद्ध न होने की ओर गए हैं।
तथा इफ्ता की स्थायी समिति से सलातुत्-तसाबीह के बारे में प्रश्न किया गया, तो उसने उत्तर दिया :
सलातुत्-तसाबीह एक बिद्अत है और उसकी हदीस साबित नहीं है, बल्कि वह घृणित है, और कुछ विद्धानों ने उसे मौज़ूआत यानी मनघढ़ंत हदीसों में उल्लेख किया है।
देखिए : फतावा स्थायी समिति 8/163.
तथा शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने फरमाया: सलातुत-तसाबीह वैद्ध और धर्मसंगत नहीं है, क्योंकि उसकी हदीस कमज़ोर है। इमाम अहमद ने फरमाया: वह सहीह नहीं है, तथा शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिया ने फरमाया कि यह झूठी है, तथा उन्हों ने कहा कि किसी भी इमाम ने इसे मुसतहब नहीं समझा है, और आप रहिमहुल्लाह ने सच कहा है। क्योंकि जो व्यक्ति इस नमाज़ के अंदर मनन-चिंतन करेगा वह इसके अंदर इसकी कैफियत और इसके तरीक़े के अंदर असामान्यताएं पायेगा, तथा इसकी अदायगी करने में असामान्यताएं पायेगा। फिर यदि वह नमाज़ धर्मसंगत होती, तो उसकी विशेषता और उसके पुण्य के कारण, वह उन चीज़ों में से होती जिसके वर्णन करने पर रिवायतें पर्याप्त होतीं। लेकिन जब ऐसा कुछ भी नहीं है और उसे किसी इमाम ने मुसतहब नहीं समझा है तो इससे पता चला कि वह सही नहीं है। और इसकी अदायगी में असामान्यताओं के कारण का पता उस हदीस से चलता है जिसमें यह रिवायत किया गया है कि वह उसे प्रति दिन एक बार या प्रति सप्ताह या प्रति माह या प्रति वर्ष या जीवन में एक बार पढ़ेगा। और यह इस बात का प्रमाण है कि वह सही नहीं है। यदि वह धर्मसंगत होती तो निरंतर रूप से धर्मसंगत होती, आदमी को उसके अंदर इस तरह के दूर और विस्तृत चुनाव का अधिकार नहीं दिया जाता। इस आधार पर, मनुष्य के लिए उसे पढ़ना उचित नहीं है। और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
फतावा मनारूल इस्लाम 1/203.